Sunday, November 2, 2014

नेपाल की तराई से भोजपुरी सिनेजगत तक : "परदेशी शाह"

नेपाल की तराई से भोजपुरी सिनेजगत तक : "परदेशी शाह"

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 अजय शास्त्री (संपादक) 
 बॉलीवुड सिने रिपोर्टर 
Email: editobcr@gmail.com
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बीसीआर (रामचन्द्र यादव/मुंबई) नेपाल के चर्चित अभिनेता परदेशी शाह अब भोजपुरी सिने जगत में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करवा रहे हैं। जी हाँ,  नेपाल फिल्म इंडस्ट्री में अपने अभिनय कौशल से अलग पहचान बनाने के बाद  प्रतिभावान नायक परदेशी शाह अब भोजपुरी सिनेमा में मजबूती के साथ कामयाब कदम रख दिये हैं। इनकी पहली भोजपुरी फिल्म - एस पी खरेल के सफल प्रदर्शन से सिनेप्रेमियों के साथ-साथ फिल्म जगत के निर्माताओं व निर्देशकों का भी ध्यान इनकी ओर आकर्षक हुआ। प्रसिद्ध निर्माता - निर्देशक रमाकान्त प्रसाद ने भोजपुरी फिल्म - प्यार किया तो डरना क्या में बतौर हीरो  चयन किया। यह फिल्म बिहार में सफल प्रदर्शन के बाद  मुंबई में भी प्रदर्शित की गई है। इसके अलावा परदेशी शाह शीघ्र ही भोजपुरी फिल्म दीवाना -2 तथा एस पी खरेल -2 में नज़र आने वाले हैं।
गौरतलब है कि कर्म ही पूजा के सिद्धांत का अनुसरण करने वाले परदेशी शाह मेहनत के बल पर अपने घर वालों और तराई नेपाल का नाम रोशन करना चाहते हैं।

Saturday, November 1, 2014

युवा पत्रकार संघ का दिवाली स्नेह सम्मलेन संपन्न

युवा पत्रकार संघ का दिवाली स्नेह सम्मलेन संपन्न
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अजय शास्त्री (संपादक)
बॉलीवुड सिने रिपोर्टर 
Email: editorbcr@gmail.com
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बीसीआर (रामचन्द्र यादव/मुंबई) पत्रकार बंधुओं की आवाज़ बुलंद करने और सभी पत्रकारों को विशाल मंच प्रदान करने हेतु अग्रणी भूमिका निभा रही युवा पत्रकार संघ का दिवाली स्नेह सम्मलेन विगत दिनों मुंबई उपनगर कांदिवली पूर्व स्थित अकुर्ली म्युनिसिपल स्कूल में संपन्न किया गया।  इस अविस्मरणीय मौके पर बहुत से पत्रकार बन्धु एकत्रित हुए तथा सभी ने युवा पत्रकार संघ की सराहना करते हुए अपने -अपने विचार भी प्रकट किये।
युवा पत्रकार संघ के अध्यक्ष - महेश गुप्ता, महासचिव - गोविन्द ठाकुर (इंडिया टीवी), सलाहकार - अनिल पाण्डेय (सामना) के नेतृत्व में मनीष झा (नव भारत टाईम्स), जय सिंह (पत्रकार), दिवाकर सिंह (आज तक), प्रमोद यादव (ए बी पी न्यूज़), मुरारी सिंह (गुलिस्तान न्यूज़), रामचन्द्र यादव (फिल्म पत्रकार), आकांक्षा सिंह (पत्रकार), राजा मयाल (एन डी टी वी) के अलावा और भी कई बड़े चैनल और अखबार के पत्रकार उपस्थित थे। इस मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में कमलेश यादव और टॉप बॉलीवुड न्यूज़ के हेड सुरजीत सिंह ने अपनी उपस्थिति जाहिर की।

मुंबई और डांस का अज़ब कनेक्शन है *मुंबई मस्ती*

मुंबई और डांस का अज़ब कनेक्शन है *मुंबई मस्ती*
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अजय शास्त्री (संपादक)
बॉलीवुड सिने रिपोर्टर 
Email: editorbcr@gmail.com
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बीसीआर (रामचन्द्र यादव /मुंबई) देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में जो  सच्ची लगन से मेहनत करते हैं उनके  सपने साकार होते  ही हैं।  माया नगरी में अगर कठिन परिश्रम है तो डांस और मस्ती भी है। खुला आसमान और मदमस्त पवन की सुखद अनुभूति भी है। जी हाँ, हम  बात कर रहे हैं म्यूजिकल वीडियो अल्बम *मुंबई मस्ती* की जिसका निर्माण कर रहे हैं कोरियोग्राफर और निर्देशक संतोष सागर। सागर मूवीज प्रोडक्शन हाउस के बैनर तले निर्माणाधीन मुंबई सिटी पर आधारित यह  एल्बम डांस और मस्ती भरपूर है, जो बहुत ही मनोरंजकपूर्ण है।  इसके अलावा इस  अल्बम में डांस (नृत्य)  के नये रूप को  दिखाने की कोशिश की जा रही है। हिप-हॉप,  लैटिन, बॉलीवुड, रोमांटिक आदि नृत्य कला को  नयापन देने की पूरी तैयारी कर लिया है नृत्य -  संतोष सागर ने। इस म्यूजिकल एलबम की पूरी शूटिंग मुंबई और बाहर के रमणीय स्थलों की जाएगी। 
 विदित हो कि  इस अल्बम के सभी गीत बहुत ही कर्णप्रिय और मधुर हैं। सुनने और देखने वाले न सिर्फ गुनगुनायेंगे बल्कि थिरकने के लिए मज़बूर हो जाएंगे। क्योंकि संतोष सागर ने  अपने कुशल निर्देशन में कई एक्सप्रीमेंट  रहे हैं। इन्होंने पहली बार अपनी सुमधुर आवाज़ में गीत भी गया है। सवाल के जवाब में सागर ने कहा कि *मुंबई मस्ती म्यूजिक वीडियो  मेरे जीवन में अहम भूमिका निभाने वाली है  क्योंकि डांस का लेबल जो भी देखने को मिल रहा है वो इंटरनेशनल है। काफी एक्सप्रीमेंट हो चुका है फिर भी हम नयापन लाने की कोशिश कर रहे हैं। ये हमारी मुम्बई मस्ती टीम के लिए चुनौतीपूर्ण है*।
रमेश तिवारी के लिखे गीत तथा गूफी के संगीत  संतोष सागर का नृत्य (डांस) कमाल का  होगा। इनकी मेहनत ज़रूर रंग लायेगी। 

मैं साध्वी हूं, आतंकी नहीं: प्रज्ञा सिंह

मैं साध्वी हूं, आतंकी नहीं: प्रज्ञा सिंह

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अजय शास्त्री (संपादक)
बॉलीवुड सिने रिपोर्टर 
Email: editorbcr@gmail.com
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(बीसीआर) मालेगांव ब्लास्ट की आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने अपने ऊपर लगे आरोपों को बेबुनियाद बताया है। अपने पिता की अंत्येष्टि में शामिल होने आई प्रज्ञा सिंह ने पत्रकारों से कहा, 'मैं एक साध्वी हूं, आतंकी नहीं। हम जनकल्याण के लिए काम करते हैं, ‌जन विनाश के लिए नहीं।'

उन्होंने कहा कि मालेगांव ब्लास्ट के मामले में उन्हें झूठा फंसाया गया है। भारी पुलिस सुरक्षा के बीच अपने पिता की अंत्येष्टि में शामिल होने आई प्रज्ञा सिंह ने कहा कि उन्हें इस मामले में कई प्रकार से प्रताड़ित भी किया गया है। उन्होंने कहा कि इस मामले में उनकी कोई भूमिका नहीं है।
गौरतलब है कि साध्वी प्रज्ञा सिंह 29 सितंबर, 2008 को मालेगांव में हुए बम विस्फोट के मामले में मुख्य आरोपियों में शामिल हैं। इस हमले में छह लोग मारे गए थे और 100 अन्य घायल हुए थे। प्रज्ञा सिंह कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं, इसके बावजूद उन्हें इलाज के लिए कोर्ट से जमानत नहीं मिली है।
नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) ने प्रज्ञा सिंह को मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में भर्ती कराने की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने पुलिस की हिरासत में इलाज कराने से इंकार कर दिया और कहा था कि वह पहले जमानत पर रिहा होना चाहती हैं।

Friday, October 31, 2014

ROAR : Film Review by Ajay Shastri (3-Star)


फिल्म समीक्षा : रोर
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फिल्म समीक्षक : अजय शास्त्री
संपादक, बॉलीवुड सिने रिपोर्टर
Email: erditorbcr@gmail.com
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प्रमुख कलाकार: अभिनव शुक्ला, हिमार्षा वेंकटस्वामी, अंचित कौर और आरन चौधरी
निर्देशक: कमल सदाना
संगीतकार: जॉन स्टीवर्ट बीजीएम
रेटिंग : तीन स्टार 
अवधि-123 मिनट
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(बीसीआर) दोस्तों फ़िल्में तो आप बहुत देखते होंगे मगर "रोर" फिल्म एक दम अलग है, निर्देशक कमल सदाना ने नए विषय पर फिल्म बनाने की कोशिश की है। सुंदरवन के जंगलों में यह एक सफेद बाघ की खोज से संबंधित कहानी है। 'रोर' में वास्तविक लोकेशन के साथ वीएफएक्स का भरपूर उपयोग किया गया है। फिल्म के अंत में निर्देशक ने स्वयं बता दिया है कि कैसे शूटिंग की गई है? निर्देशक की इस ईमानदारी से फिल्म का रहस्य टूटता है।
उदय फोटोग्राफर है। वह जंगल की खूबसूरती कैमरे में कैद करने आया है। अपनी फोटोग्राफी के दौरान वह सफेद बाघ के एक शावक को बचाता है। बाघिन अपने शावक की गंध से उदय के कमरे में आ जाती है। वह उसे मार देती है। उदय की लाश तक नहीं मिल पाती। उदय का भाई पंडित सेना में अधिकारी है। वह अपने दोस्तों के साथ भाई की लाश खोजना चाहता है। साथ ही वह बाघिन को मार कर बदला लेना चाहता है। बदले की इस कहानी में बाघिन विलेन के तौर पर उभरती है। फॉरेस्ट ऑफिसर और स्थानीय गाइड के मना करने पर भी वह अपने अभियान पर निकलता है। इस अभियान में बाघिन और पंडित के बीच रोमांचक झड़पें होती हैं।
'रोर' में छिटपुट रूप से सुंदरवन के रहस्य उद्घाटित होते हैं। जंगल की खूबसूरती माइकल वॉटसन की फोटोग्राफी में निखरी दिखती है। फिल्म के एक्शन दृश्य भी ठीक हैं। कमी है तो फिल्म में नाटकीयता और उपयुक्त संवादों की। फिल्म के किरदार ढंग से नहीं गढ़े गए हैं। वे सही प्रभाव नहीं छोड़ पाते। हालांकि अभिनव शुक्ला ने पंडित की जिद को पर्दे पर उतारने की कोशिश की है। 'रोर' में सूफी (आरन चौधरी), आदिल चहल और वीरा (सुब्रत दत्‍ता) ही अपने किरदारों के साथ न्याय कर सके हैं।
ढीली पटकथा और कमजोर कहानी की वजह से 'रोर' बांध नहीं पाती। कहानी सुंदरवन में घुसती है, लेकिन इंसानों तक ही सीमित रहती है। बाघिन का चित्रण और फिल्मांकन किसी मनुष्य की तरह किया गया है। न्यू तकनिकी दृश्यों और भिड़ंत से फिल्म कमजोर हो गई है।

Super Nani : Film Review by Ajay Shastri (2.5 Star)


फिल्म समीक्षा : सुपर नानी 
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फिल्म समीक्षक : अजय शास्त्री
संपादक, बॉलीवुड सिने रिपोर्टर
Email: editorbcr@gmail.com
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प्रमुख कलाकार: रेखा, शरमन जोशी, रणधीर कपूर और अनुपम खेर।
निर्देशक: इंद्र कुमार
संगीतकार: हर्षित सक्सेना और संजीव-दर्शन।
रेटिंग : २.५ स्टार 
अवधि: 133 मिनट
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(बीसीआर) 'रंग' 'दिल' और 'बेटा' जैसी फिल्में दे चुके इंद्र कुमार पुराने स्कूल के माहिर निर्देशक के तौर पर जाने जाते हैं। हाल के बरसों में वे 'ग्रैंड मस्ती' जैसी सफल एडल्ट कॉमेडी भी दे चुके हैं। मगर 'सुपर नानी' कमजोर फिल्म है। फिल्म का विषय भले मार्मिक और नीयत पाक है, मगर उसकी पटकथा गढऩे में चूक कर दी गई है। हिंदुस्तान में अधिकांश घरों में बच्चों व बुजुर्गों का खयाल नहीं रखा जाता है। उस मुद्दे को इंद्र कुमार ने उठाया, पर उसका ट्रीटमेंट सतही है।
भारती भाटिया रईस बिजनेसमैन आरके भाटिया की पत्नी है। परिवार की बेहतरी के लिए उसने अपनी महत्वाकांक्षाओं की तिलांजलि दे दी। अपनी जिंदगी के चालीस साल उसने किचन को दे दिए। उसके पति और बहू-बेटे को भारती के महान त्याग का एहसास नहीं है। कदम-कदम पर उसे लूजर और बेवकूफ कहा जाता है। घर-परिवार की नजरों में उसकी जगह सिफर है। ऐसे में उसके तारणहार के तौर पर उसका नाती मन अमेरिका से आता है। वह भारती भाटिया के भीतर का स्वाभिमान जगाता है। उन्हें विज्ञापन जगत का एक जाना-माना नाम बनाता है। परिवार में उसकी जगह को फिर से पुख्ता करता है। रिया और विज्ञापन फिल्मकार मिस्टर सैमी ऊर्फ बम्बू उसकी मदद करते हैं।
भारती भाटिया का किरदार रेखा ने निभाया है। फिल्म पूरी तरह उनके कंधों पर टिकी है। उन्होंने अपनी भूमिका के साथ न्याय भी किया है। मन की भूमिका में शरमन जोशी हैं। वे अमेरिका से लौटे प्रवासियों की तरह भ्रष्ट हिंदी बालते हैं। बिजनेसमैन आरके भाटिया को रणधीर कपूर ने प्ले किया। क्रूर पति के तौर पर वे निर्दयी नहीं नजर आ पाए हैं। रिया के किरदार में श्वेता कुमार हैं, जो इंद्र कुमार की बेटी हैं। उन्हें नाममात्र का स्पेस मिला है। वह ध्यान खींच पाने में नाकाम रही हैं। अनुपम खेर विज्ञापन बनाने वाले शख्स के तौर पर असर नहीं छोड़ सके हैं। श्रेया नारायण फिल्म में बहू की भूमिका में हैं। ग्रे शेड को उन्होंने ठीक ठाक निभाया है।
हर्षित सक्सेना और संजीव-दर्शन की संगीत प्रभावहीन है। समीर और संजीव चतुर्वेदी के गीत औसत हैं।

Happy New Year : Film Review by Ajay Shastri (3.5 Star)


फिल्म समीक्षा : हैप्पी न्यू ईयर 
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फिल्म समीक्षक : अजय शास्त्री
संपादक, बॉलीवुड सिने रिपोर्टर
Email: editorbcr@gmail.com
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प्रमुख कलाकार: शाहरुख खान, दीपिका पादुकोण, अभिषेक बच्चन, बोमन ईरानी, सोनू सूद और विवान शाह
निर्देशक: फराह खान
निर्माता : रेड चिली प्रोडक्शन 
संगीतकार: विशाल
रेटिंग : 3.5 स्टार
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(बीसीआर) दोस्तों ये फिल्म सिर्फ लक पर चली है ये नहीं कहा जा सकता कि किसके लक से ये फिल्म चली है क्योंकि फिल्म में मल्टीस्टार कास्ट है फिल्म की वही घिसी पिटी कहानी है मगर पुराने घिसे पिटे फार्मूले को ही फराह खान ने अपने नए अंदाज में ऐसे पेश किया गया है कि दर्शकों को देखने के लिए मजबूर होना पड़ा. फराह खान और शाह रुख खान की जोड़ी की तीसरी फिल्म 'हैप्पी न्यू ईयर' आकर्षक पैकेजिंग का सफल नमूना है। पिता के साथ हुए अन्याय के बदले की कहानी में राष्ट्रप्रेम का तडका है। नाच-गाने हैं। शाहरुख की जानी-पहचानी अदाएं हैं। साथ में दीपिका पादुकोण, अभिषेक बच्‍चन, सोनू सूद, बोमन ईरानी और विवान शाह भी हैं। सभी मिलकर थोड़ी पूंजी से मनोरंजन की बड़ी दुकान सजाते हैं। इस दुकान में सामान से ज्‍यादा सजावट है। घिसे-पिटे फार्मूले के आईने इस तरह फिट किए गए हैं कि प्रतिबिंबों से सामानों की तादाद ज्‍यादा लगती है। इसी गफलत में फिल्म कुछ ज्‍यादा ही लंबी हो गई है। 'हैप्पी न्यू ईयर' तीन घंटे से एक ही मिनट कम है। एक समय के बाद दर्शकों के धैर्य की परीक्षा होने लगती है।
चार्ली (शाहरुख खान) लूजर है। उसके पिता मनोहर के साथ ग्रोवर ने धोखा किया है। जेल जा चुके मनोहर अपने ऊपर लगे लांछन को बर्दाश्त नहीं कर पाते। चार्ली अपने पिता के साथ काम कर चुके टैमी और जैक को बदला लेने की भावना से एकत्रित करता है। बाद में नंदू और मोहिनी भी इस टीम से जुड़ते हैं। हैंकिंग के उस्ताद रोहन को शामिल करने के बाद उनकी टीम तैयार हो जाती है। संयोग है कि ये सभी लूजर है। वे जीतने का एक मौका हासिल करना चाहते हैं। कई अतार्किक संयोगों से रची गई पटकथा में हीरों की लूट और वर्ल्‍ड डांस कंपीटिशन की घटनाएं एक साथ जोड़ी गई है। फराह खान ने अपने लेखकों और क्रिएटिव टीम के अन्य सदस्यों के सहयोग से एक भव्य, आकर्षक, लार्जर दैन लाइफ फिल्म बनाई है, जिसमें हिंदी फिल्मों के सभी प्रचलित फॉर्मूले बेशर्मी के साथ डाले गए हैं।
कहा जाता है कि ऐसी फिल्मों के भी दर्शक हैं। शायद उन्हें यह फिल्म भी अच्‍छी लगे। कला में यथास्थिति बनाए रखने के हिमायती दरअसल फिल्म को एक व्यवसाय के रूप में ही देखते हैं। 'हैप्पी न्यू ईयर' का वितान व्यावसायिक उद्देश्य से ही रचा गया है। अफसोस है कि इस बार फराह खान इमोशन और ड्रामा के मामले में भी कमजोर रही है। उन्होंने फिल्म की पटकथा में इसी संभावनाओं को नजरअंदाज कर दिया है। किरदारों की बात करें तो उन्हें भी पूरे ध्यान से नहीं रचा गया है। चार्ली के बदले की यह कहानी आठवें-नौवें दशक की फिल्मों का दोहराव मात्र है, जो तकनीक और वीएफएक्स से अधिक रंगीन, चमकदार और आकर्षक हो गया है।
कलाकारों में शाह रुख खान ऐसी अदाकारी अनेक फिल्मों में कर चुके हैं। वास्तव में यह फिल्म उनकी क्षमताओं का दुरुपयोग है। फराह खान ने अन्य कलाकारों की प्रतिभाओं की भी फिजूलखर्ची की है। दीपिका पादुकोण ने मोहिनी के किरदार में चार-छह मराठी शब्दों से लहजा बदलने की व्यर्थ कोशिश की है। बाद में डायरेक्टर और एक्टर दोनों लहजा भूल जाते हैं। अभिषेक बच्‍चन डबल रोल में हैं। उन्होंने फिल्म में पूरी मस्ती की है। स्पष्ट दिखता है कि उन्होंने सिर्फ निर्देशक की बात मानी है। अपनी तरफ से कुछ नहीं जोड़ा है। यही स्थिति बाकी कलाकारों की भी है। सोनू सूद धीरे-धीरे बलिष्ठ देह दिखाने के आयटम बनते जा रहे हैं। बोमन अपने लहजे से पारसी किरदार में जंचते हैं। विवान शाह साधारण हैं।
'हैप्पी न्यू इयर' निश्चित ही आकर्षक, भव्य और रंगीन है। फिल्म अपनी संरचना से बांधे रखती है। फिल्म का गीत-संगीत प्रभावशाली नहीं है। फराह खान खुद कोरियोग्राफर रही हैं। फिर भी 'हैप्पी न्यू ईयर' के डांस सीक्वेंस प्रभावित नहीं करते। दीपिका पादुकोण की नृत्य प्रतिभा की झलक भर मिल पाती है। फराह खान और शाह रुख खान की पिछली दोनों फिल्में 'मैं हूं ना' और 'ओम शांति ओम' से कमजोर फिल्म है 'हैप्पी न्यू ईयर'।

Jigariya : Film Review by Ajay Shastri (2 Star)


फिल्म समीक्षा : जिगरिया 
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फिल्म समीक्षक : अजय शास्त्री
संपादक, बॉलीवुड सिने रिपोर्टर
Email: editorbcr@gmail.com
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प्रमुख कलाकार: हर्षवर्धन देव, चेरी मार्डिया, वीरेंद्र सक्सेना और केके रैना
निर्देशक: राज पुरोहित
संगीतकार: अगनेल-फैजान और राज-प्रकाश।
रेटिंग : दो स्टार 
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(बीसीआर) दोस्तों आपने एक बात तो सुनी ही होगी कि "कौवा चला हंस की चाल अपनी भी भूल गया" ऐसा ही कुछ इस फिल्म में देखने को मिला, सन् 1986 की पृष्ठभूमि में ताजमहल के शहर में शामू और राधा की प्रेम कहानी ने जन्म तो लिया लेकिन उसे जीवन नहीं मिल पाया। 'प्रतिघात' और 'लव 86' फिल्मों के पोस्टर से भान हुआ कि यह फिल्म उस कालखंड की होगी। लेखक-निर्देशक ने किसी और तरीके से समय का संकेत नहीं दिया है। शामू हलवाई परिवार का लड़का है और राधा ब्राह्मण परिवार की लड़की है। अंतर्जातीय प्रेम और विवाह को आज भी पूर्ण स्वीकृति नहीं मिल पाई है। 28 साल पहले तो और भी मुश्किलें थीं।
निर्देशक राज पुरोहित ने अंतर्जातीय प्रेम और विवाह की इस फिल्म के लिए जिन किरदारों को अपना प्रतिनिधि चुना है, वे अपने व्यक्तित्व से प्रभावित नहीं करते। पढऩे-लिखने में फिसड्डी शामू शायरी के नाम पर तुकबंदी करता है और राधा तो अभी संभवत: स्कूल में ही पढ़ती है। ऐसे अव्यस्क किरदारों का प्रेम लिखना और दिखाना समीचीन नहीं है। खास कर फिल्म का अंत तो अनावश्यक और अप्रासंगिक है। बहरहाल, लेखक-निर्देशक ने इस प्रेम कहानी में हिंदी फिल्मों में सैकड़ों बार दिखाए जा चुके प्रसंगों, दृश्‍यों और संवादों का सहारा लिया है। पटकथा और दृश्य संरचना में ढीलापन है। बार-बार लगता है कि हम देखी हुई फिल्मों की नकल देख रहे हैं।
कलाकारों में केवल वीरेंद्र सक्सेना और केके रैना ही अपने किरदारों के साथ न्याय कर सके हैं। बाकी सारे कलाकारों के अभिनय में नकल और नाटकीयता है। शामू और राधा की मुख्य भूमिका निभा रहे हर्षवर्धन एवं चेरी मार्डिया अभी नए और अनगढ़ हैं। उनके चरित्रों को सही ढंग से गढ़ा भी नहीं गया है। लोकेशन की स्थानीयता प्रभावित करती है, लेकिन बार-बार नदी, पुल और ताजमहल का दिखना प्रभाव कम करता है। मुंबई के दृश्य भी घिसे-पिटे तरीके से पेश किए गए हैं। शामू के दोस्त के रूप में आए अभिनेता केतन सिंह में स्पार्क है, लेकिन उन्हें भी निर्देशक ने कैरीकेचर बना दिया है।
'जिगरिया' उत्तर भारत के रंग और खुशबू के बावजूद निर्देशकीय सीमाओं के कारण सामान्य फिल्म बनकर रह गई है।

Ikkiss Topon Ki Salami : Film Review by Ajay Shastri (3 Star)

फिल्म समीक्षा : इक्कीस तोपों की सलामी
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फिल्म समीक्षक : अजय शास्त्री 
(संपादक) बॉलीवुड सिने रिपोर्टर
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प्रमुख कलाकार: अनुपम खेर, नेहा धूपिया और दिव्येंदु शर्मा।
निर्देशक: रवींद्र गौतम
संगीतकार: राम संपत
रेटिंग : तीन स्टार 
अवधि: 140 मिनट
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(बीसीआर) एडल्ट कॉमेडी के दौर में तंज कसने वाली फिल्म की भी अपनी ऑडिएंस है। 'फंस गए रे ओबामा', 'जॉली एलएलबी' और 'दो दूनी चार' उस मिजाज की स्तरीय फिल्में रही हैं। 'इक्कीस तोपों की सलामी' भी उसी तेवर और कलेवर की फिल्म है। फिल्म के कहानीकार राहिल काजी और निर्देशक रवींद्र गौतम भी अपने मकसद में सफल हुए हैं। फिल्म की यूएसपी उसका इमोशनल कार्ड है। वह कई मौकों पर दर्शकों के दिल को छूती है। वह साथ ही मुंबई शहर की जुझारू और लोगों की सहयोगी प्रवृत्ति भी दिखाती है।
फिल्म ईमानदार नगर निगम कर्मचारी पुरुषोत्तम नारायण जोशी के संघर्ष की कहानी है। वह गर्व से मच्छरों को भगाने वाली दवा का छिड़काव करता है। वह उसे छोटा काम नहीं मानता। खुद्दारी के चलते वह अपना सारा जीवन गुरबत में काट देता है, मगर समझौते नहीं करता। उसकी सोच व हालत से दोनों बेटे सुभाष और शेखर परेशान हैं। दोनों आज केयुवाओं की तरह ढेर सारा पैसा कमाना चाहते हैं। सुभाष भ्रष्ट सीएम के लिए काम करता है। शेखर अपने पिता की तरह निगम कर्मचारी ही है। रिटायरमेंट वाले दिन पुरूषोत्तम पर चोरी का इल्जाम लगता है। यह सदमा वे बर्दाश्त नहीं कर पाते। उनके अंत समय में सुभाष और शेखर को अपनी गलतियों का एहसास होता है। वे अपने मरहूम पिता का खोया सम्मान लौटाने निकल पड़ते हैं। वे ठान लेते हैं कि पिता के पार्थिव शरीर को इक्कीस तोपों की सलामी दिलानी है। उस काम में उनका साथ देती है सीएम की पीए तान्या श्रीवास्तव।
राहिल काजी ने दिलचस्प कथा रची है, जो इशारों-इशारों में नेताओं व मीडिया बिरादरी के स्याह पक्ष को पेश करती है। नेहा धूपिया संघर्षरत अभिनेत्री की भूमिका में हैं। उनका नाम जयप्रभा है। फिल्म के हर सीन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। वे तेज गति और रोचक तरीके से भ्रष्टाचार और ईमानदारी के अंतद्र्वंद्व को पेश करती है। अनुपम खेर ने जानदार परफॉर्मेंस दी है। पुरुषोत्तम जोशी के अवतार में बेबस मगर अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने वाले शख्स की भूमिका को उन्होंने जीवंत बना दिया है। दिव्येंदु शर्मा का कॉमिक अवतार लोगों ने अब तक देखा है, मगर यहां उनका विद्रोही रूप असर छोड़ता है। फिल्म की हीरोइन अदिति शर्मा भी अपने किरदार तान्या और राजेश शर्मा भ्रष्ट सीएम के रोल के संग न्याय करती हैं। फिल्म का संगीत भी निराश नहीं करता।

Tamanche : Film Review by Ajay Shastri (3 Star)

फिल्म समीक्षा : तमंचे
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फिल्म समीक्षक : अजय शास्त्री 
(संपादक) बॉलीवुड सिने रिपोर्टर
Email: editorbcr@gmail.com
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प्रमुख कलाकार: निखिल द्वेदी  और रिचा चड्ढा
निर्देशक: नवनीत बहल
रेटिंग : तीन स्टार 
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(बीसीआर) "तमंचे" फिल्म एक अलग तरह की फिल्म है. इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हिंदी फिल्मों की रोमांचक अपराध कथाओं में अमूमन हीरो अपराध में संलग्न रहता है। हीरोइन किसी और पेशे या परिवार की सामान्य लड़की रहती है। फिर दोनों में प्रेम होता है। 'तमंचे' इस लिहाज से एक नई कथा रचती है। यहां मुन्ना (निखिल द्वेदी) और बाबू (रिचा चड्ढा) दोनों अपराधी हैं। अचानक हुई मुलाकात के बाद वे हमसफर बने। दोनों अपराधियों के बीच प्यार पनपता है, जो शेर-ओ-शायरी के बजाय गालियों और गोलियों केसाथ परवान चढ़ता है। निर्देशक की नई कोशिश सराहनीय है।
मुन्ना और बाबू की यह प्रेम कहानी रोचक है। एक दुर्घटना के बाद पुलिस की गिरफ्त से भागे दोनों अपराधी शुरू में एक-दूसरे के प्रति आशंकित हैं। साथ रहते हुए अपनी निश्छलता से वे एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। मुन्ना कस्बाई किस्म का ठेठ देसी अपराधी है, जिसने वेशभूषा तो शहरी धारण कर ली है, लेकिन भाषा और व्यवहार में अभी तक भोलू है। इसके पलट बाबू शातिर और व्यवहार कुशल है। देह और शारीरिक संबंधों को लेकर वह किसी प्रकार की नैतिकता के द्वन्द में नहीं है। हिंदी फिल्मों में आ रही यह नई सोच की लड़की है। मुन्ना भी इस मामले में कस्बाई नैतिकता से निकल चुका है। दोनों अपनी मजबूरियों और सीमाओं को जानते हुए हद पार करने की कोशिश करते हैं। दोनों के बीच प्रेम का मजबूत तार है।
प्रोडक्शन के पहलुओं से थोड़ी कमजोर यह फिल्म किरदारों और कलाकारों की वजह से उम्दा बनी रहती है। यों सारे किरदार कुछ जदा ही बोलते नजर आते हैं। लेखक-निर्देशक शब्दों और संवादों में संयम रख पाते तो निखिल और रिचा के परफॉर्मेंस को स्पेस मिलता। रिचा समर्थ अभिनेत्री हैं। वह बाबू के जटिल चरित्र को बारीकी से पेश करती है। उन्होंने विपरीत भावों को साथ-साथ निभाने में दक्षता दिखाई है। निखिल ने भी मुन्ना के किरदार को खास बना दिया है, लेकिन एक्सप्रेशन और परफॉरमेंस में उनका संकोच जाहिर होता है। ऐसा लगता है कि उन्हें और खुलने की जरूरत है। राणा के किरदार को निभा रहे दमनदीप सिद्धू को लेखक-निर्देशक ने पर्याप्त मौका दिया है। वे प्रभावित भी करते हैं, लेकिन याद नहीं रह पाते। वे किरदार की चारित्रिक विशेषता नहीं रच पाए हैं।
हिंदी में इस विधा की फिल्में नहीं के बराबर हैं। यह फिल्म थोड़ी अनगढ़ और अपरिपक्व लगती है। इसके बावजूद 'तमंचे' अपनी नवीनता के कारण उल्लेखनीय है। हम सभी जानते हैं कि निखिल द्वेदी और रिचा चड्ढा हिंदी फिल्मों के पॉपुलर चेहरे नहीं हैं। उन्होंने अपनी अदाकारी और ईमानदारी से 'तमंचे' को मजबूती दी है। वे फिल्म की आंतरिक कमियों की भी भरपाई करते हैं।